गुवाहाटी ।

कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने के बाद भावुक पूर्व नौकरशाह एमजीवीके भानु ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मेरी जन्मभूमि असम नहीं, आंध्रप्रदेश है। लेकिन अपने जीवन के 33 वर्ष यहां बिताने और असम के लोगों से मिले आत्मिक स्नेह ने इतना बांध लिया है कि अब शेष जीवन इसी पवित्र भूमि की सेवा में गुजारने का प्रण कर लिया है। जीवन की पहली पारी आईएएस अधिकारी के रूप में और दूसरी पारी जनसेवक के तौर पर बिताने का इरादा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा से पार्टी सदस्यता ग्रहण करने के फौरन बाद राज्य के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव ने साफ कर दिया कि वे तेजपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ने के इरादे के साथ कांग्रेस में आए हैं।



हालांकि उन्होंने फिर अपने को संभालते हुए कहा कि वे आवेदन देंगे। पार्टी नेतृत्व उन्हें टिकट देगा तो वे पूरी जान लगा देंगे, चुनाव जीतने के लिए। अगर पार्टी नेतृत्व किसी अन्य को टिकट देता है तो वे उसके लिए भी उतनी ही मेहनत करेंगे, जितनी अपने लिए करने का इरादा है। भानु ने बताया कि अवकाश ग्रहण करने के बाद वे काफी सोच-विचार में थे। कहां जाएं, क्या करें, कहां रहें। क्योंकि वर्ष 1985 में आईएएस के तौर पर यहां आने और विभिन्न दायित्वों में राज्य के अलग-अलग स्थानों से लेकर नई दिल्ली में रहने तक उनके जीवन के 33 साल गुजर गए। उस दौरान उन्होंने हर समय मनसा-वाचा-कर्मणा केवल असम के हित के लिए सोचा और किया।
उन्होंने तय कर लिया कि यहीं रहेंगे। असम में भी तेजपुर से उन्हें बहुत लगाव है। इसलिए वहीं घर बनवाने लगे। पूर्व आईएएस ने कहा, वे कभी भी बहुत बुद्धिमान नहीं रहे। लेकिन ईश्वर ने दो चीजें उन्हें दी हैं। एक कठोर मेहनत और दूसरा सतत काम करने की लगन। दोनों के चलते वे अभी भी बीस घंटे तक काम करने के लिए खुद को उपयुक्त पाते हैं।



उनके श्वसुर नरसिंह राव के समय केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। इस नाते पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन सिंह घटवार से उनके पुराने पारिवारिक संबंध रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस में शामिल होने और चुनावी राजनीति में कूदने का फैसला कर लिया। आखिर काम करने के लिए एक उपयुक्त मंच तो चाहिए ही था। राजनीति में खुद को एलपी स्कूल के विद्यार्थी जैसा मानते हुए भी भानु ने कहा कि अपने तीन दशक के प्रशासनिक कार्यकाल में उन्होंने कई सारे राजनीतिज्ञों को काफी करीब से देखा-समझा है, सब सुना है। भीतर क्या है और है और बाहर क्या है, यह भी जाना है। इन सबके आधार पर उन्हें राहुल गांधी की तरह ईमानदार, स्पष्टवादी और समर्पित राजनीतिज्ञ फिलहाल राष्ट्रीय फलक पर नहीं दिखाई देता।



तेजपुर को अपना राजनीतिक कार्यक्षेत्र बनाने की वजह उनके मुताबिक शोतिपुण जिले में दो सौ साल से रह रहे आंध्र प्रदेश के नायडू परिवारों की बदतर हालत है। लोगों के पास दो शताब्दियां बीतने के बाद भी रहने को घर नहीं और बच्चों के पढ़ने को स्कूल नहीं।