नई दिल्ली। ।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे राज्य जहां हिंदुओं की संख्या काफी कम है, उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा, जिन राज्यों में संख्या के लिहाज से हिंदू कम हैं, क्या उन्हें अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सरकारी फायदे दिए जा सकते हैं? क्या राज्य विशेष में इस आधार पर अल्पसंख्यक का दर्जा केन्द्रीय स्तर से अलग तय किया जा सकता है। 



सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग(एनसीएम) को 3 महीने में इससे संबंधित रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने उन सभी राज्यों में जहां हिंदू संख्या बल के हिसाब से कम है और वहां दूसरे धर्म की बहुसंख्यक आबादी है, वहां हिंदुओं की स्थिति का जायजा लेकर उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने या नहीं देने के लिए रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया है। 



भाजपा नेता व वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने ये निर्देश दिया। पीठ ने कहा, सर्वप्रथम एनसीएम को इस पर विचार करना है कि हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए या नहीं। कोर्ट ने कहा कि रिट पिटिशन पर विचार करने के स्थान पर याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई करते हुए हमें यह उचित लग रहा है कि एनसीएम इसे देखे। 



एनसीएम को नवंबर 2017 के आकड़ों के आधार पर इस मसले पर अपनी रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए और इसे जितना जल्दी संभव हो जमा करें, बेहतर होगा कि यह तीन माह में ही जमा कर दी जाए। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 8 राज्यों में हिंदू कम संख्या में हैं। ये राज्य हैं लक्षद्वीप(2.5 फीसद), मिजोरम(2.75), नागालैंड(8.75), जम्मू कश्मीर (28.44), अरुणाचल प्रदेश(29), मणिपुर(31.39) और पंजाब(38.40 फीसद)। 



याचिकाकर्ता ने इन 8 राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन राज्यों में संख्या में कम होने के कारण अल्पसंख्यकों के अधिकारों से इन्हें वंचित किया जा रहा है। इन्हें नेशनल कमिशन फॉर माइनॉरिटी एक्ट के तहत केन्द्र व राज्य से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित किया जाता है। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था और उन्हें एनसीएम के पास जाने का सुझाव दिया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि आयोग की तरफ से कोई जवाब नहीं मिलने के बाद उन्होंने फिर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई।