असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता तरुण गोगोई ने पूर्व सैनिक मोहम्मद सनाउल्लाह मामले को लेकर राज्य की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने इस मामले में सर्बानंद सोनोवाल की सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया। इससे पहले असम बॉर्डर पुलिस ने अपनी जांच में सनाउल्लाह को विदेशी घोषित कर उन्हें हिरासत में ले लिया था। इस मामले के जरिए तरुण गोगोई ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा, एनआरसी रद्दी कागज है, लाखों सही नागरिकों के इससे बाहर होने की वजह से यह बेकार साबित होगा। पूर्व मुख्यमंत्री का यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को यह काम सिर्फ सिर्फ राज्य एनआरसी समन्वयक प्रतीक हाजेला पर नहीं छोड़ना चाहिए।




आपको बता दें कि देश में असम इकलौता राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है।असम में सिटिजनशिप रजिस्टर देश में लागू नागरिकता कानून से अलग है। यहां असम समझौता 1985 से लागू है और इस समझौते के मुताबिक, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक राज्‍य में प्रवेश करने वाले लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा। नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) के मुताबिक, जिस व्यक्ति का सिटिजनशिप रजिस्टर में नहीं होता है उसे अवैध नागरिक माना जाता है। इसे 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था। इसमें यहां के हर गांव के हर घर में रहने वाले लोगों के नाम और संख्या दर्ज की गई है।



एनआरसी की रिपोर्ट से ही पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं है। आपको बता दें कि वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्‍तान के बंटवारे के बाद कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी जमीन असम में थी और लोगों का दोनों और से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी रहा।इसके बाद 1951 में पहली बार एनआरसी के डाटा का अपटेड किया गया। इसके बाद भी भारत में घुसपैठ लगातार जारी रही। असम में वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भारी संख्‍या में शरणार्थियों का पहुंचना जारी रहा और इससे राज्‍य की आबादी का स्‍वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने एक आंदोलन शुरू किया था। आसू के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौत पर हस्‍ताक्षर किए गए थे।




इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, उसकी देखरेख में 2015 से जनगणना का काम शुरू किया गया। इस साल जनवरी में असम के सिटीजन रजिस्‍टर में 1.9 करोड़ लोगों के नाम दर्ज किए गए थे जबकि 3.29 आवेदकों ने आवेदन किया था। असम समझौते के बाद असम गण परिषद के नेताओं ने राजनीतिक दल का गठन किया,  जिसने राज्‍य में दो बार सरकार भी बनाई। वहीं 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप को अपडेट करने का फैसला किया था। उन्होंने तय किया था कि असम में अवैध तरीके से भी दाखिल हो गए लोगों का नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप में जोड़ा जाएगा लेकिन इसके बाद यह विवाद बहुत बढ़ गया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया।